आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान रहमतुल्लाह अलैह – ज़िंदगी और इल्मी कमालात

आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान


🦁 जंगल का सफ़र और शेर

कहा जाता है कि आला हज़रत एक बार सफ़र में थे।
सफ़र के दौरान काफ़िला एक ऐसे जंगल से गुज़र रहा था जहाँ लोग कहते थे कि बहुत ख़तरनाक शेर रहते हैं।

लोगों में डर था कि कहीं हमला न हो जाए।
इसी दौरान अचानक एक बड़ा और डरावना शेर काफ़िले के सामने आ गया।
सब लोग सहम गए, लेकिन आला हज़रत बिल्कुल बेख़ौफ़ थे।
✨ आला हज़रत की दुआ

आला हज़रत ने फ़ौरन अल्लाह की तरफ़ तवज्जुह की और दुआ की:
“ऐ अल्लाह! हम तेरे हबीब ﷺ के उम्मती हैं, हमारी हिफ़ाज़त फ़रमा।”

जैसे ही दुआ की, शेर एकदम ठहर गया।
फिर आला हज़रत ने उस शेर की तरफ़ देखा और कहा:
“अगर तू अल्लाह का बंदा है तो हमें नुक़सान न पहुँचा, बल्कि हमारी हिफ़ाज़त कर।”

🦁 शेर का तअज्जुबअंगेज़ अंदाज़

सुभान अल्लाह!
ये सुनकर शेर ज़मीन पर बैठ गया, पूँछ हिलाने लगा जैसे कि आज्ञाकारी कुत्ता हो।
फिर वो शेर काफ़िले के आगे-आगे चलने लगा और उन्हें पूरे जंगल से सुरक्षित बाहर निकाल दिया।

लोग हैरान थे और बोले:
“आला हज़रत! ये कैसी करामात है कि जंगल का शेर भी आपके हुक्म का ताबेदार हो गया।”

आला हज़रत ने फ़रमाया:
“ये मेरी ताक़त नहीं, बल्कि अल्लाह की मदद और हबीब ﷺ की बरकत है।

💡 सबक

दोस्तों! इस वाक़्या से हमें ये सबक मिलता है कि जब इंसान सच्चे दिल से अल्लाह और उसके रसूल ﷺ से मोहब्बत करता है तो अल्लाह तआला उस इंसान की हिफ़ाज़त ऐसे तरीक़े से करता है जिसकी लोग तसव्वुर भी नहीं कर सकते।

🕊️ आख़िरी बीमारी

आला हज़रत जब अपने ज़िंदगी के आख़िरी सालों में पहुँचे तो अक्सर बीमार रहने लगे।
मगर बीमारी के बावजूद उनका इबादत और तिलावत-ए-कुरआन का सिलसिला जारी रहा।
दिन-रात वो किताबें लिखते, सवालों के जवाब देते और उम्मत को सही रास्ते की तरफ़ बुलाते।

यहाँ तक कि आख़िरी दिनों में भी उन्होंने तर्जुमा-ए-कुरआन और फतवा लिखना नहीं छोड़ा।

📜 वसीयत

आला हज़रत ने अपनी उम्मत को जो वसीयत छोड़ी, वो आज भी हमारे लिए रहनुमा है।
उन्होंने फ़रमाया:

हमेशा नमाज़ की पाबंदी करना।

कुरआन और हदीस से मोहब्बत रखना।

सच्चे दिल से अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की इताअत करना।

औलिया-ए-किराम और नेक लोगों की सोहबत में रहना।

हर उस चीज़ से बचना जो दीन से दूर करे।


उनकी आख़िरी वसीयत का मक़सद यही था कि मुसलमान अपने ईमान को मज़बूत करें और इस्लाम पर डटे रहें।

🌹 विसाल

आख़िरकार, 25 सफ़र 1340 हिजरी (1921 ईस्वी) को आला हज़रत का विसाल हो गया।
बरैली शरीफ़ का वो छोटा-सा शहर उस दिन रो पड़ा, और पूरे हिंदुस्तान में ग़म की लहर दौड़ गई।

मगर दोस्तों! एक हक़ीक़त ये भी है कि आज भी उनके इल्म, उनकी नातें, उनके फतवे और उनका फ़ैज़ पूरी दुनिया में ज़िंदा है।
लाखों लोग आज भी उनके बताए रास्ते पर चलकर दीन की हिफ़ाज़त कर रहे हैं।

💡 सबक

दोस्तों! आला हज़रत की ज़िंदगी हमें ये सिखाती है कि जब इंसान अपनी ज़िंदगी अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के लिए गुज़ार देता है, तो उसका नाम और काम हमेशा ज़िंदा रहता है।

 

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